धार्मिक उन्माद आज इतना हावी हो गया है कि सब के सब अंधे हो चुके हैं।आज दार्शनिकता ऐसे गायब हो गया है जैसे गदहे के सिर से सिंग।पढ़े-लिखे और न पढ़े-लिखे लोगों के बीच सिर के बाल की मोटाई के बराबर अंतर है।आज गाँव कस्बा से लेकर देश-दुनिया में धार्मिक टकराव की घटनाएँ बहुधा देखने को मिलते हैं।सहसनशीलता, सहिष्णुता की जगह अमर्यादित आचरण और दृश्य गली कूचों से लेकर देश के सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर आये दिन लोमहर्षक और वीभत्स दृश्य के साथ दिखाई पड़ते हैं।
मैं पूछता हूँ हर एक इंसान से कि पहले धर्म जरूरी है या इंसान का इंसानियत ?या जानना चाहता हूँ कि पहले कौन आया धर्म या इंसान ? मेरा स्वयं का मानना है कि इंसान पहले आया।इसलिए इंसानियत हमारा पहला धर्म है।हमें किसी चीज को पहले बचाना है तो वो है मानव मात्र को बचाना।इस पृथ्वी का कोई अनमोल जीव है अगर तो है मनुष्य।आज जीवन संघर्ष के पथ पर तृष्णा रूपी चुड़ैल के आगोश में बैठकर भौतिकता को गले लगाने के लिए धरती का अनुपम उपहार मानव रूपी जीव अनायास दलदल में धँसता जा रहा है।
धर्म तो मानव मात्र का संहिता है जिससे मानव समाज को नियंत्रित और मर्यादित रखा जाता है।आप यूँ कह सकते हैं कि धर्म को मानव धारण करता है जैसे कपड़े।जो वस्तु धारण की जाती है उसे समय के पन्नों पर त्याग सकते हैं परिस्थिति के अनुकूल।
धर्म के आड़ में उपद्रव और भय का माहौल बनाना अति निंदनीय और असभ्यतापूर्ण कार्रवाई है।अगर किसी धर्म के लोगों द्वारा ऐसा माहौल बनाया जाता है तो अवश्य ही उस धर्म के अंदर कमियाँ हैं।
मेरा व्यक्तिगत अभिमत है कि सभी धर्म किताबों में अच्छी बातें तो दर्शाते हैं,पर उसके मानने वाले अज्ञानी लोग चिंतन-मनन के अभाव में उस धर्म को बदनाम करते हैं प्रतिकूल आचरण के द्वारा।
कहीं कोई मरता है या घटता है तो वो मानव-मात्र है।महज काल्पनिक धौंस और हुकूमत के मायावी जाल में उलझकर रक्तरंजित कार्यों से इतिहास दुहराता रहता है।जो किसी भी कोने से न्यायोचित नहीं है।
विश्व रंगमंच पर हालिया दिनों में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच में टकराव और युद्ध जैसी स्थिति बड़ा उदाहरण है। हमने विश्व को गुटबाजी का हिस्सा बनते देखा है और यह सब धर्म के आड़ में।
कहने का अभिप्राय यह है कि आज धर्म का आचरण की कमी सभी जगह दिख रहे हैं।नतीजतन लोग रक्तपिपासु बन चुके हैं।जंगली जानवर और मानव जाति के बीच अब खास अंतर नहीं रह गया है।जब देखो जहाँ देखो खूनी मंजर दिख जाते हैं।
यह सब यथार्थतः धर्म के बारे में ज्ञान और उससे ज्यादा मनन-चिंतन के अभाव के कारण हो रहे हैं।आवश्यकता है लोगों को अंतरात्मा की आवाज को महसूस कर प्रतिक्रिया करने की।
हम बड़े से बड़े मसले को ठंडे दिमाग से चाहे तो सुलझा सकते हैं,लेकिन इसके लिए धैर्य और ज्ञान की सहायता जरूरी है।
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ReplyDeleteGreat thinker
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